एक और मौत

भारतीय समाज की मानसिकता समझना मेरी समझ के परे है। पॉर्न स्टार को सर पर चढाके रखनेवाला यह समाज बलात्कार से बची हुई औरत को नफरत की निगाहोंसे कैसे देख सकता है?

सुझेट जॉर्डन की हालही में मेनिन्जायटिस (मस्तिष्क ज्वर) की वजह से मौत हो गई। सन २०१२ में, सुझेट कोलकाता में बलात्कार जैसे हादसे से गुजर चुकी थी। लेकिन न्याय के बदले सुझेट ने केवल उपेक्षा ही पायी थी

जाहिर सी बात है, मन की निराशा को दूर करने के लिए सुझेट जिन दवाईयों का सेवन करती थी, उसका गहरा असर उनके मस्तिष्क पर भी हुवा होगा। सन २०१३ में सुझेट ने खुले आम अपने साथ हुए हादसे की बात जाहिर की थी। सत्यमेव जयते में भी उन्होंने सारी सच्चाई बतायी थी। लेकिन उसके बाद भी सुझेट को न्याय नही मिला। बल्कि कुछ लोगों ने उनके चरित्र पर शक कर लिया।

जो लोग औरतों के कपडों की लंबाई नापते है, वह लोग अपने विचारों कि गहराई को नापना कब सिखेंगे? कब तक अपनी विकृत मनोवस्था का समर्थन करने के लिए औरत को जिम्मेदार ठहराते रहेंगे?

सुझेट जैसी ना जाने कितनी ही महिलाएं किसी ना किसी वजह से डिप्रेशन का शिकार होकर अपना जीवन त्याग देती है। लेकिन इस समाज की आनेवाली पिढीको जन्म देने वाली औरत के लिए क्या हमारे पास सिर्फ पुरूषों से तुलना करना ही बचा हुवा है? क्या हम उसे एक इन्सान की तरह कभी देख ही नही सकते?

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