भारतीय जीवनशैली और बारात का कुतूहल

भारतीय जीवनशैली आणि वरातीचं कुतूहल - मराठी अनुवाद

बचपनमें घर के सामने रस्तेपर कितनेही जुलूस, दिखावे देखे थे । अयप्पाका जुलूस, सांईबाबाकी पालकी, गणेश चतुर्थी और अनंतचतुर्दशी का उत्सव...और न जाने कितनेही! लेकिन फिर भी शादीकी बारात के लिए मेरे मन में विशेष कुतूहल रहा है। अगर शादी पुरे ठाट-बाट से की गई तो बारात होनी ही चाहिए। अपनी-अपनी आर्थिक सक्षमतानुसार कोई डि.जे. बारात, बेंजो बारात तो कोई सिर्फ बॅंड-बाजा बजाकर शादी की बारात ले आते थे । मेरे मनमें हमेश यह सवाल उठता था कि इस तरह धूम-धाम से शादी करनाही क्या जीवना का सर्वोच्च यश है; अन्यथा बाजा बजाते हुए बारात निकालने का क्या अर्थ हो सकता है?

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यूं देखा जाए तो भारतीय संस्कृतीके अनुसार पिछले दशक तक विवाह होनेमें और उसे आजीवन निभाने में स्त्रियों का बहुत बडा योगदान रहा है । कन्याका विवाह शीघ्रातिशिघ्र हो जाए यह माता-पिताकी इच्छा होती थी । पुरूष बुढा हो, कुरूप हो, विधुर हो फिरभी वह पुरूष होता था । विवाह पश्चात उसका नाम अपने नामके आगे लगानेसे स्त्री को सामाजिक सुरक्षा मिलती थी । वहींपर विवाहिता को यह चिंता सताती थी अगर पती से विभक्त हो गई तो मायके में उसके साथ अच्छा व्यवहार नही होगा, समाज में बदनामी होगी । इसलिए विवाह करना और उसे निभाना यह स्त्री के लिए अधीक महत्व रखता था या फिर ऐसा कहन चाहिए के स्त्री के लिए उसका अधीक महत्व बनाया गया था । फिर शादी की बारात से क्या स्त्रीयों को यह साबित करना था कि विवाह जैसा सर्वोच्च यश उन्होंने संपादन किया है ? मुझे लगत है, शादी की बारात में वधूसे अधीक वर और रिश्तेदारोंको ज्यादा रूची थी । लेकिन बारात जैसा प्रदर्शन करके वर को भी क्या साबित करना था?

वास्तवमें भारतीयों के सर्वोच्च यश कि तलिका में विवाह विधी का नाम अगर होगा भी तो बहुत निचले स्थान पर होगा । शिक्षा में यश संपादन करना, अच्छी तनख्वॉह वाली नौकरी पाना, किसी कर्जे में डूबे बिना खुदका एक घर होना जैसी चिजोंको भारतीय अधीक महत्त्व देते है, यह बात साधारण निरीक्षण से भी पता चल सकती है । लेकिन इन चिजों में यश संपादन करने के पश्चात कुछ गिने-चुने लोगों को पार्टी देकर मामला खत्म हो जाता है लेकिन शादी-भ्याह के मामले में पुरे खानदान रिश्तेदारोंको बारात में शामिल किये बगैर काम नही चलता ऐसी क्या विशेषता है इस विधी में? हर पुरूष को एक स्त्री और हर नारी को एक नर मिलना निश्चित तो होता ही है !

अनेक वर्षों तक इस प्रश्न ने मुझे उलछाये रखा । लेकिन इसका जवाब मुझे मिला ज्येष्ठ इतिहासकार वि.का. राजवाडेजीने लिखी हुई किताब भारतीय विवाहसंस्थेचा इतिहास में । विवाहसंस्था से जुडे कई सवालों के जवाब इस पुस्तक को पढने के बाद मुझे मिले । आश्चर्य नही हुवा बल्कि मेरे विचार योग्य दिशा की ओर थे इस तथ्य को जानकर समाधान मिला । आज के युग में जो निंद्य समझा जाता है, वह प्राचीन काल में सर्वमान्य था किंतू ज्यों-ज्यों समाज/प्रजा का विस्तार होने लगा, त्यों त्यों नियमों में कठोरता आने लगी । फिर भी प्राचीन काल में पालन किये जाने वाली औपचारिकता को मानव पूर्णत: भुला नही पाया है और उसीका प्रतिबिंब हमे आजभी विवाह संपन्न होते समय सप्तपदी, अग्नी के सामने फेरे लेना जैसे विधियों में दिखता है । बडे मजेकी और विचित्र बात है कि अगर विवाह का कानूनन पंजीकरण ना हुवा हो, तो इन्ही विधीयोंकी तस्वीरें विवाह संपन्न होने प्रमाण/सबूत मानी जाती है ।

एक और चुभने वाली चीज यह भी है कि मानवने इतनी प्रगती कर ली नैतीक-अनैतिकता के बीच का अंतर समझकर उसने नियमोंमें अधीक कठोरता लायी किंतू क्या ऐसा नही लगता कि आजका समाज फिरसे उसी पुराने, पाशवी युगकी ओर सफर कर रहा है? छोटे बच्चोंपर होने वाले अत्याचार, रिश्तोंका सम्मान ठुकराकर स्त्री-पुरूषोंपर होने वाले बलात्कार किस बातका संकेत करते है ?

© कांचन कराई

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